मुठी भरी रेतसी है ये ज़िन्दगी
हर पल हाथसे छूटती..
बटोर लो उन लम्हों को आज
जिन्हे सांसे है बुनती
आज हमे जो दे रहा है,
कल वो शायद न हो
जो लम्हे कल जिए थे,
वो आज हो न हो
चंद लम्हे मिलती है हसी
आंसुओ के संग पिलो कभी
ख्वाबों के अस्तर तले
इनके साथ भी जिलों कभी
ज़िन्दगी में पाए कुछ मोती
यादों में समेट लो इन्हे
कुछ लम्हे हमारे साथ है
क्यों न हसके जिलें इन्हे.
---परिणीता (१८/०२/२०२१)